ब्रज उत्सव -परिचय
![]() हमारे ब्रज में बांके बिहारी जी के अनेक उत्सव मनाये जाते है साल के 365 दिन है तो बिहारी जी के 370 उत्सव है जो कि वृंदावन में सभी बड़े धूम धाम से मनाते है हर दिन एक नया उत्सव ब्रज में तो उत्सवों कि धूम है इसलिए ब्रज का हर दिन नया नवयामान है जैसे हमारे बिहारी जी है उन्हें तो जब भी देखो गे तभी नव नव रंगी छावीले रसीले सजीले कान्हा ही लगेगे उसी तरह उनके उत्सव है नया नवरंगी हमारे ब्रज में हर दिन अपने साथ नया उत्सव नया जोश लेकर आता है.
जब बिहारी जी ने पहली बार छीका तो 'छीक उत्सव', जब पहली बार करवट ली तो 'करवट उत्सव', जब बसंत आया तो 'बसंतोत्सव', फागुन आया 'फाग उत्सव',जब भोग लगाया तो 'खिचड़ी उत्सव',सावन आया तो 'झूला उत्सव',कार्तिक आया तो 'कार्तिक स्नान उत्सव',और भी अनेको उत्सव जैसे हमारे कान्हा अनंत है, उनकी कथाएँ भी अनंत है उनके भक्त भी अनंत है लीलाये भी अनंत है, इसी प्रकार उनके उत्सव भी अनंत है, भक्त के मन में आया आज अपने भगवान का ऐसे भजने का मन कर रहा है. तो बस वही उत्सव बन गया. बड़े ही प्यारे प्यारे उत्सव है. ऐसे ही कुछ उत्सवो को प्रस्तुत करने की हमारी छोटी सी कोशिश है.वरना हम कहाँ कुछ भी लिख सकते है ये तो हमारे समर्थ से परे की बात है.
"जय जय श्री राधे"
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- ऋतुराज बसंत का उत्सव
- खिचड़ी अति प्रिय है ठाकुर जी को
- श्री अंग का ताप मिटाने ठाकुर जी को कराते है चन्दन का श्रृंगार
- चांदी की अंगीठी से प्रभु को शीत से बचाया जाता है
- जब ठाकुर जी के श्रृंगार में सबकुछ श्वेत हो जाता है.
- राधारानी जी का सर्वप्रिय सांझी उत्सव
- ठाकुर जी का हिंडोला उत्सव
- जब मणियों से जड़ी नौका में श्री श्यामाश्याम करते है जलबिहार
- आज व्रज में होली रे रसिया
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