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मणि मंजरी एक सखी

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श्री राधारानी का  सारा कृष्णानुराग, श्रीकृष्णसेवन श्रीकृष्ण सुख के लिए ही है. वे जब यह सोचती हैं कि श्री कृष्ण को मुझसे वह सुख नहीं मिलता, जो अन्यत्र मिल सकता है तो वे देवता को मनाती हैं कि श्री कृष्ण मुझको छोड़ कर अन्यत्र सुख प्राप्त करें.

 

उनकी सखी गोपियाँ भी श्री राधा और श्यामसुंदर के सुख सम्पादन में ही नित्य लगी रहती हैं. वे कभी श्यामसुंदर से मिलती भी है तो उनके रसास्वादन की वृद्धि के लिए ही, स्वसुख के लिए नहीं.  इसी प्रकार जिन सखियों में  नव प्रीती भाव का उदय होता , वे मंजरीगण भी नित्य निरन्तर श्री श्यामा-श्याम युगल के सुखसम्पादन अथवा प्रीतिवहन में ही अपने को कृतार्थ मानती हैं. उनमे तनिक भी निज सुख भोग का न तो प्रलोभन है, न दूसरे का सुख सौभाग्य देखकर ईर्ष्याजनित जलन है.

प्रेम भाव का आदर्श मणि मंजरी सखी 

 

प्रसंग - एक बार श्री राधिका जी ने मणि मंजरीनाम कि एक सखी के प्रेम भाव का आदर्श देखने के लिए एक सखी को उनके पास भेजकर उसी कि ओर से यह कहलवाया - 'सखी ! श्री ललिता, विशाखा आदि,  राधा गोविन्द की सेवा में 'सखी भाव' से रहती ही हैं. कभी कभी वे नायिका के रूप में भी श्यामसुंदर के समीप पधारती हैं . तुम भी इसी प्रकार श्री कृष्ण के समीप जाकर उन्हें सुख प्रदान करो और स्वयं उनसे सुख प्राप्त करो. श्री कृष्ण मिलन के समान सुख की कहीं तुलना तो दूर रही, तीनो लोकों और तीनो कालों में उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती. तुम्हारा रूप गुण, सौंदर्य, माधुर्य, चातुर्य - सभी विलक्षण हैं ' अतएव तुम इस परमानंद से वंचित क्यों रहती हो ? श्यामसुंदर के समीप जाकर उनका प्रत्यक्ष सेवानंद प्राप्त करो. 

 

इस बात को सुनकर मणि मंजरी ने उक्त सखी से कहा - 'बहिन ! कल्याणमयी श्री राधा श्री श्यामसुंदर के साथ मिलकर जो सुख प्राप्त करती हैं , वही मेरे लिए मेरे अपने मिलन से अनन्त गुना अधिक सुख है. मै अपने लिए दूरे किसी सुख की कभी कल्पना ही नहीं कर सकती तुम मुझे क्यों भुलाती हो ? मुझे तो तुम भी यही वरदान दो कि में श्री राधा गोविन्द के मिलन सुख को ही नित्य निरन्तर अपना परम सुख मानूँ और उसी पवित्र कार्य में अपने जीवन का एक-एक क्षण लगाकर अनिवर्चनीय और अचिन्त्य सुख प्राप्त करती रहूँ.' यही प्रेम की महिमा है.

 

इसी से इस पवित्र सर्वत्यागमय प्रेम की तुलना में इंद्र का पद, ब्रह्मा का पद, सार्वभौम साम्राज्य, पाताल का राज्य, योग सिद्धि, एवं मोक्ष पर्यंत सभी नगण्य हैं, क्योंकि उन सभी में स्व सुख कामना का किसी न किसी अंश में अस्तित्व है, पूर्ण त्याग नहीं है. इस पूर्ण त्याग को ही परम आदर्श मानने वाला मानव त्याग के मार्ग में अग्रसर होकर परम प्रेम और परमानंद को प्राप्त करके धन्य होता है.

 

घर, पड़ोस, गाँव, देश, विश्व, विश्वात्मा और सबके मूल स्वरुप सर्वाधार, सर्वमय, सर्वातीत भगवान् के लिए जितना जितना ही त्याग होता है, उतना उतना ही भोगासक्ति, प्राणी पदार्थों की ममता, विषय कामना, मिथ्या अहंकार का नाश होकर दिव्य प्रेम प्राप्त होता है और उतना उतना ही दिव्य मधुर अनन्त आनंद बढता है.  इसी से भक्तों ने प्रेम को पुरुषार्थ - चतुष्टय के मोक्ष से भी उच्चतम पंचम पुरुषार्थ बताया है.

 

"जय जय श्री राधे"  


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Comments
2011-07-01 17:46:25 By Prateek Sharma

radhe

2011-07-01 17:46:25 By Prateek Sharma

radhe

2011-06-29 11:46:43 By Shivani Goyal

radhey

2011-05-06 05:25:24 By ??? ???????

जय जय श्री राधे !

2011-04-22 09:36:21 By Jyoti khanna

*Jai Jai Shri RadheKrishna* Very Nice......

2011-03-25 16:00:21 By nidhi

Mani Manjari Sakhi Ka Prem Kitini Uccha Koti Ka Hai Sachmuch Aadarsh Hai.

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