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श्राद्ध का समय और स्थान कैसा हो ?

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श्राद्ध का स्थान - श्राद्ध के लिए उपयुक्त स्थान , समुद्र तथा समुद्र में गिरने वाली नदियों के तट पर, गौशाला में जहाँ बैल न हों, नदी-संगम पर, उच्च गिरिशिखर पर, वनों में लीपी-पुती स्वच्छ एवं मनोहर भूमि पर, गोबर से लीपे हुए एकांत घर में नित्य ही विधिपूर्वक श्राद्ध करने से मनोरथ पूर्ण होते हैं और निष्काम भाव से करने पर व्यक्ति अंतःकरण की शुद्धि और परब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति कर सकता है, ब्रह्मत्व की सिद्धि प्राप्त कर सकता है।

श्राद्ध किसी दूसरे के घर में दूसरे की भूमि में कभी नही करना चाहिये,जो भूमि सार्वजनिक हो,जैसे समुद्र के किनारे, वन, पर्वत जिस भूमि पर किसी का स्वामित्व नही हो, वहां श्राद्ध कर्म किया जा सकता है,शास्त्रीय निर्देशों के अनुसार दूसरों के घर मे श्राद्ध करने पर खुद के पितरों को कुछ नही मिलता है, गृहस्वामी के पितर बलपूर्वक श्राद्ध करने वाले के पितरों से सब कुछ छीन लेते है।


यदि किसी विवशता के कारण ही दूसरे के गृह अथवा भूमि में श्राद्ध करना पडे,तो सर्वप्रथम उस भूमि का किराया अथवा मूल्य उस भूस्वामी को दे देना चाहिये।

काशी, गया, प्रयाग, रामेश्वरम् आदि क्षेत्रों में किया गया श्राद्ध विशेष फलदायी होता है। गया में श्राद्ध करने का बड़ा महत्व माना गया है। प्रतिमास मृत्यु-तिथि पर मृतक का मासिक श्राद्ध किया जाता है। प्रतिवर्ष मृत्यु-तिथि को एकोदिष्ट श्राद्ध किया जाता है। आश्विन कृष्ण पक्ष में प्रतिवर्ष पार्वण श्राद्ध किया जाता है। काशी, प्रयाग, हरिद्वार आदि तीर्थों में तीर्थ-श्राद्ध किया जाता है। तथा गयाधाम में गया-श्राद्ध करने का विधान है। तीन, तेरह, सवा माह और एक वर्ष में भी जो पितर मुक्त नहीं हो पाते हैं उसके लिए अंतिम विकल्प के तौर पर गया में पूर्ण श्रद्धापूर्वक श्राद्ध किया जाता।घर में किये गये श्राद्ध का पुण्य तीर्थ-स्थल पर किये गये श्राद्ध से आठ गुना अधिक मिलता है।

                                               "तीर्थादष्टगुणं पुण्यं स्वगृहे ददत: शुभे"

श्राद्ध की तिथि - आपको यदि अपने पूर्वजों की तिथि याद नहीं है तो इस प्रकार भी कर सकते है, बच्चे का श्राद्ध पंचमी को, बुजुर्ग महिला-पुरुष का नवमी को करें। पितृगणों का श्राद्ध उनकी मृत्यु तिथि (दाह संस्कार वाली तिथि )के अनुसार किया जाता है। किन्तु जिनकी मृत्यु दुर्घटना, अस्त्र, शस्त्र, जीव, पशु, विश, आत्महत्या, जलकर, डूबकर, विद्युत, गिरने आदि कारणों से हुई हो उनकी ज्ञात तिथि को छोड़कर चतुर्दशी के दिन श्राद्ध किया जाता है। जिनकी तिथि ज्ञात नहीं होती उनका श्राद्ध आश्विन कृष्ण पक्ष की अमावस को जिसे सर्वपितृ श्राद्ध कहा जाता है इसी दिन स्नानादि कर पितृ विसर्जन कर दिया जाता है। 

कूर्म पुराण में आया है कि "अमावस्या के दिन पितर लोग वायव्य रूप धारण कर अपने पुराने निवास के द्वार पर आते हैं और देखते हैं कि उनके कुल के लोगों के द्वारा श्राद्ध किया जाता है कि नहीं। ऐसा वे सूर्यास्त तक देखते हैं। जब सूर्यास्त हो जाता है, वे भूख एवं प्यास से व्याकुल हो निराश हो जाते हैं, चिन्तित हो जाते हैं, बहुत देर तक दीर्घ श्वास छोड़ते हैं और अन्त में अपने वंशजों को कोसते (उनकी भर्त्सना करते हुए) चले जाते हैं। जो लोग अमावस्या को जल या शाक-भाजी से भी श्राद्ध नहीं करते उनके पितर उन्हें अभिशापित कर चले जाते हैं।"


श्राद्ध का समय - अपरान्ह का समय, सबसे उत्तम कहा गया है. कुतपकाल (जब सूर्यका ताप घटने लगता है, उस समय का नाम है ‘कुतप’), रात्रि में श्राद्ध नहीं करना चाहिये, उसे राक्षसी कहा गया है। दोनों सन्ध्याओंमें तथा पूर्वाह्णकालमें भी श्राद्ध नहीं करना चाहिये ।


                                                                "जय जय श्री राधे"

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श्राद्ध पक्ष


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