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श्री जगन्नाथ पुरी मंदिर

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स्थान - पुरी भारत के उडीसा प्रान्त का एक जिला है.भारत के चार पवित्रतम स्थानों में से एक है पुरी, जहां समुद्र इस शहर के पांव धोता है.कहा जाता है कि यदि कोई व्यक्ति यहां तीन दिन और तीन रात ठहर जाए तो वह जीवन-मरण के चक्कर से मुक्ति पा लेता है.यहाँ विश्व का सबसे बड़ा समुद्री तट है.पुरी एक ऐसा स्थान है जिसे हजारों वर्षों से कई नामों - नीलगिरी, नीलाद्रि, नीलाचल, पुरुषोत्तम, शंखश्रेष्ठ, श्रीश्रेष्ठ, जगन्नाथ धाम, जगन्नाथ पुरी - से जाना जाता है.पुरी में दो महाशक्तियों का प्रभुत्व है, एक भगवान द्वारा सृजित है और दूसरी मनुष्य द्वारा सृजित है।

 

श्री विग्रह -  पुरी के महान मन्दिर में तीन मूर्तियाँ हैं -

  1. भगवान जगन्नाथ,
  2. बलभद्र 
  3. उनकी बहन सुभद्रा की।

ये सभी मूर्तियाँ काष्ठ की बनी हुई हैं।

जगन्नाथ भगवान मंदिर

यह 65 मी. ऊंचा मंदिर पुरी के सबसे शानदार स्मारकों में से एक है.इस मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में चोडागंगा ने अपना राजधानी को दक्षिणी उड़ीसा से मध्य उड़ीसा में स्थानांतररित करने की खुशी में करवाया था.यह मंदिर नीलगिरी पहाड़ी के आंगन में बना है.चारों ओर से 20 मी. ऊंची दीवार से घिरे इस मंदिर में कई छोट-छोटे मंदिर बने हैं.मंदिर के शेष भाग में पारंपरिक तरीके से बना सहन, गुफा, पूजा-कक्ष और नृत्य के लिए बना खंबों वाला एक हॉल है.इस मंदिर के विषय में वास्तव में यह एक आश्चर्यजनक सत्य है कि यहां जाति को लेकर कभी भी मतभेद नहीं रहे हैं.

 

जगन्नाथ  भगवान की कथा

 

प्रसंग १. - इस मंदिर के उद्गम से जुड़ी परंपरागत कथा के अनुसार, भगवान जगन्नाथ की इंद्रनील या नीलमणि से निर्मित मूल मूर्ति, एक अंजीर  वृक्ष के नीचे मिली थी.यह इतनी चकचौंध करने वाली थी, कि धर्म ने इसे पृथ्वी के नीचे छुपाना चाहा मालवा  नरेश इंद्र द्युम्न को स्वप्न में यही मूति दिखाई दी थी.तब उसने कड़ी तपस्या की, और तब भगवान विष्णु  ने उसे बताया कि वह पुरी के समुद्र तट पर जाये, और उसे एक दारु (लकड़ी) का लठ्ठा मिलेगा.उसी लकड़ी से वह मूर्ति का निर्माण कराये.राजा ने ऐसा ही किया, और उसे लकड़ी का लठ्ठा मिल भी गया.उसके बाद राजा को विष्णु और  विश्वकर्मा बढ़ई कारीगर और मूर्तिकार के रूप में उसके सामने उपस्थित हुए.किंतु उन्होंने यह शर्त रखी, कि वे एक माह में मूर्ति तैयार कर देंगे, परन्तु तब तक वह एक कमरे में बंद रहेंगे, और राजा या कोई भी उस कमरे के अंदर नहीं आये.माह के अंतिम दिन जब कई दिनों तक कोई भी आवाज नहीं आयी, तो उत्सुकता वश राजा ने कमरे में झांका, और वह वृद्ध कारीगर द्वार खोलकर बाहर आ गया, और राजा से कहा, कि मूर्तियां अभी अपूर्ण हैं, उनके हाथ अभी नहीं बने थे.राजा के अफसोस करने पर, मूर्तिकार ने बताया, कि यह सब दैववश हुआ है, और यह मूर्तियां ऐसे ही स्थापित होकर पूजी जायेंगीं.तब वही तीनों जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां मंदिर में स्थापित की गयीं.

 

प्रसंग २.- जगन्नाथ पुरी की रथ यात्रा के संदर्भ में एक पौराणिक कथा प्रचलित है.  कथा इस प्रकार है, एक बार द्वारका में श्री कृ्ष्ण की रानियों ने माता रोहिणी से निवेदन किया की वे उन्हें भगवान श्री कृ्ष्ण की ब्रजलीला, गोपियों, और उनके प्रेम प्रसंगों के विषय में कुछ बतायें. 

 

शुरु में माता ने उन्हें टालने का प्रयास किया और रानियों के द्वारा अत्यधिक आग्रह करने पर उन्होने वर्णन सुनाया. तब सुभद्रा को भवन के द्वार पर खडा रहने का आदेश दिया गया, और कहा गया कि किसी को भी अन्दर न आने दें. संयोगवश उसी समय श्री कृ्ष्ण और बलराम वहां आ गयें. सुभद्रा ने माता रोहिणी के आदेश का पालन करते हुए उन्हें वही रोक दिया.  

 

द्वार पर ही खडे खडे तीनों ने ब्रज प्रेम का वर्णन सुन लिया. देव ऋषि नारज जी भी यह सुना और देखा तो भगवान से विनती कि, हे भगवन आप इसी प्रेम रुप में यहां विराचित हों. भगवान श्री कृ्ष्ण ने नारद देव की बात मान ली. यहां के मंदिर में विराजमान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और बहन सुभद्रा तीनों की मूर्तियां है.

 

इन मूर्तियों की विशेषता है, कि इन मूर्तियों के पैर नहीं है, कंधे है, परन्तु हाथ नहीं है. और ये मूर्तियां लकडी की बनी है. और प्रत्येक 12 वर्ष में इन्हें बदल दिया जाता है. साथ ही 12वीं सदी से ये रथ यात्रा चली आ रही है. जगन्नाथ पुरी यात्रा गुंदीचा मंदिर तक जाती है. इसके मार्ग में मौसीमा मंदिर में भगवान को खिचडी का भोग लगाया जाता है. 

 

जगन्नाथ रथयात्रा

 

रथयात्रा से दो सप्ताह पूर्व जेठ पूर्णिमा को तीनों प्रतिमाओं को स्नान कराया जाता है.इसके लिए इन्हें रत्‍‌नवेदीसे उठाकर स्नान-मंडप में लाया जाता है.प्रत्येक मूर्ति को 108घडों से स्नान कराया जाता है.अति स्नान के कारण देवगण बीमार हो जाते हैं.15दिनों तक विभिन्न जडी-बूटियों से उनकी चिकित्सा की जाती है.इन दिनों देव विग्रहोंका दर्शन जनता नहीं कर पाती है.देवगणोंको जडी-बूटियों का भोग लगाया जाता है.इस कर्मकाण्ड को स्नान पूर्णिमा कहते हैं।रथयात्रा जगन्नाथ मन्दिर से प्रारम्भ होती है तथा गुंडिचा मन्दिर तक समाप्त होती है.आषाढ मास की शुक्ल द्वितीया को जगन्नाथ पुरी में यह रथ यात्रा निकलती है,इस रथ यात्रा में जगन्नाथ जी का रथ बलभद्र जी का रथ और सुभद्रा जी का रथ शामिल होता है,

 

भगवान जगन्नाथ के रथ का निर्माण लकडी से होता है.जगन्नाथजी का रथ ४५ फ़ुट ऊंचा और ३५ फ़ुट लम्बा और ३५ चौडा होता है, भगवान जगन्नाथ के लाल-पीले रंग के रथ का नाम नन्दिघोष है.इसे चक्रध्वज,गरुडध्वज और कपिध्वज भी कहते हैं.इसमें जुते घोडों के नाम शंख, बलाहक,श्वेत एवं हरिदाश्व हैं.रथ के सभी घोडे श्वेत वर्ण के होते हैं.इस रथ के रक्षक नृसिंह भगवान हैं।

 

बलभद्र जी का रथ ४४ फ़ुट लम्बा और ४३ फ़ुट ऊंचा होता है, लाल-पीले रंग के बलराम के रथ का नाम तालध्वजहै.इसे बहलध्वजभी कहते हैं.रथ के सभी घोडे कृष्ण वर्ण के होते हैं और उनके नाम तीव्र, घोर, दीर्घाश्रमएवं सुवर्णनाभहैं.रथ के रक्षक वासुदेव हैं।

 

सुभद्रा के काले-पीले रंग के रथ का नाम दर्पदलन है.इसे पद्मध्वज भी कहा जाता है.इसकी घोडिया भूरा रंग की होती हैं और उनके नाम रोचिका, मोचिका, जिता एवं अपराजिता है.रथ की रक्षिका जयदुर्गा हैं.जगन्नाथ जी के रथ में १६ पहिया तथा बलभद्र जी के रथ में और सुभद्रा जी के रथ में १२ १२ पहिये होते है, ये रथ प्रतिवर्ष नये बनाये जाते है,

 

इन रथों को मनुष्य खींचते है,मंदिर के सिंह द्वार पर बैठकर भगवान जनकपुरी की ओर रथ यात्रा करते है,जनकपुरी पहुंच कर तीन दिन भगवान वहां ठहरते है,वहां उनकी भेंट लक्ष्मी जी से होती है,उसके बाद भगवान पुन: जगन्नाथपुरी लौट आते है,इस रथ यात्रा को देखने के लिये देश के कोने कोने से यात्री आते है,इस मंदिर की प्रतिमाओं को वर्ष में एक बार इस दिन मंदिर से बाहर निकाला जाता है।

 

और, वस्तुत:, पूरे भारतवर्ष और विश्व के पर्यटकों के लिए रथ-यात्रा आकर्षण का प्रमुख केंद्र है, यह यात्रा जून माह में आयोजित होती है-जो पुरी यात्रा के लिए सर्वश्रेष्ठ समय है.भगवान जगन्नाथ, उनकी बहन सुभद्रा और भाई बलभद्र को वार्षिक अवकाश पर मुख्य मंदिर से 2 कि.मी. दूर एक छोटे मंदिर 'गुंडिचा घर' में ले जाया जाता है.यह यात्रा रथ-यात्रा के रूप में आयोजित की जाती है.गुंडिचा मंदिर के श्रद्धालु भक्त तीनों मूर्तियों को अलग-अलग रथ (लकड़ी के रथ) में खींचकर ले जाते है.इन रथों को व्यापक रूप से विविध रंगों में सजाया जाता है, ये रंग प्रत्येक मूर्ति के महत्व के दर्शाते हैं।

 

रथ यात्रा और नव कालेबाड़ा पुरी के प्रसिद्ध पर्व हैं.ये दोनों पर्व भगवान जगन्नाथ की मुख्य मूर्ति से संबद्ध हैं.नव कालेबाड़ा पर्व बहुत ही महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान है, तीनों मूर्तियों- भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा का बाहरी रूप बदला जाता है.इस दौरान पूरे विधि-विधान और भव्य तरीके से 'दारु' (लकड़ी) को मंदिर में लाया जाता है।

 

इस दौरान विश्वकर्मा (लकड़ी के शिल्पी) 21 दिन और रात के लिए मंदिर में प्रवेश करते हैं और नितांत गोपनीय ढंग से मूर्तियों को अंतिम रूप देते हैं.इन नए आदर्श रूपों में से प्रत्येक मूर्ति के नए रूप में 'ब्रह्मा' को प्रवेश कराने के बाद उसे मंदिर में रखा जाता है.यह कार्य भी पूर्ण धार्मिक विधि-विधान से किया जाता है।यह भव्य त्योहार नौ दिनों तक मनाया जाता है।

 

पौराणिक मान्यता है कि द्वारका में एक बार श्री सुभद्रा जी ने नगर देखना चाहा, तो भगवान श्रीकृष्ण और श्रीबलराम जी उन्हें पृथक रथ में बैठा कर अपने रथों के मध्य में उनका रथ करके उन्हें नगर दर्शन कराने ले गए. इसी घटना के स्मरण के रूप में भक्तगण भगवान के इस परम धाम में प्रत्येक वर्ष इस रथ यात्रा का भव्यता पूर्वक आयोजन करते हैं.

 

 कैसे पहुँचे

आप रेल, बस तथा हवाई जहाज से पूरी पहुँच सकते हैं.सबसे नजदीक का हवाईअड्डा यहाँ से 60 किलोमीटर दूरी पर स्थित है.अगर पर्यटक समुद्री तट का आनंद उठाना चाहते हैं तब वे गर्मियों में छुटि्टयाँ मनाने के लिए पुरी आ सकते हैं.भ्रमण करने के लिए यहाँ पर बस, टैक्सी तथा ऑटो की सेवाएँ उपलब्ध हैं।

 

"जय जय श्री राधे"


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Comments
2013-04-05 15:43:41 By Rashmi Ghimire

RADHE RADHR ......MANGAL PREM PRANAM

2013-03-30 06:42:50 By Arun Bhardwaj

JAI HO JAI HO JAI HO KOTTI KOTTI BAR JAI HO
SHRI BHAGVAN KEE JAI HO

2013-03-18 06:40:06 By Arun Bhardwaj

JAI JAGANNATH BALBHADRA SUBHDRA KEE JAI HO

2013-03-09 06:33:16 By Arun Bhardwaj

HARE KRISHANA
JAI JAGANNATH JAI BALBHADRA JAI SUBHADRA KEE JAI HO HARI HARI JAI JAI SHRI HARI BOL

2013-02-02 07:26:52 By Arun Bhardwaj

JAI HO PRABHU APKEE JAI HO

2013-01-24 07:32:47 By Arun Bhardwaj

JAI JAGANNATH SWAMI

2013-01-01 10:00:31 By mamta rani

JAGANNATH JI MUJ PER OR MERAI MATA PITA, DONO BHAI DONO BHABHIYA OR BHATIJE OR BETI PER OR PURAI PARIVAR PER APNI KRIPA BANAYE RAKHNA OR SAB KO LAMBI UMAR DENA

2013-01-01 09:45:39 By mamta rani

jagannath ji hamko bhi parivar sahit khushi khushi apnai dar bula lo

2012-12-11 09:19:07 By Dhananjay Mondal

jai jagatnath

2012-06-22 07:10:09 By FOCUS LAB KURUKSHETRA {HARYANA}

JAI JAGANATH
PURI JI

2012-06-21 17:07:07 By shant kumar soni

jai balram subhadra krishna ki unki kripa hum par hamesha bani rahe

2012-06-11 04:42:58 By giridhari goswami

मैं यह जानना चाहता हूँ कि कृष्ण, बलराम, और सुभद्रा की एक साथ मौसी के यहाँ कब जाना हुआ था जिसकी याद में यह रथ यात्रा होती है?

2012-05-15 11:23:58 By Ashish Upadhyay

Hey prabbhu kab bulaoge ???

2012-03-10 15:26:32 By Kishore Kishan

jay jay shri jagnnath hari hari boll lord krishna help

2012-01-05 10:08:34 By Munna kumar Shaw

Mai Shri Jagarnath Ji Ka darsan Karna Chahata Hu Shri Jagarnath ji ka bulaba aae ga to darsan pa lu ga thank you

2011-11-13 14:21:17 By kali prasad pandey

SHRI JAGANNATH SWAMI KI AASHIM ANUKAMPA SE MAI SAPRIWAR DO BAR DARSHAN KAR CHUKA HOON AUR PARBHU JAGATPATI SE BENTI KARTA HOON KI SAB KO DARSHAN DEN.

2011-08-17 04:23:30 By Ashish Rai

jai sri jagannath ji

2011-08-09 09:38:25 By Vipin Sharma

Bhagwan ki kripa se main is temple ke darshan kar aaya hoon. (12 days)

2011-08-06 19:08:09 By Gulshan Piplani

जय जय जय बोलो जगन नाथ की|जय जय जय बोलो बलदेव हाथ की|संग डोले सुभद्रा रानी जय बोलो उनके साथ की

2011-07-03 06:42:41 By yogini thakur

itni adbhut jankari dene ke liye bahut bahut shukriya ...........jai jai shri radhye

2011-06-29 14:55:22 By Amit

jai jagannath,baldev,subhadra ji ki jai.

2011-06-27 11:28:08 By DreamOdisha

Jai Jagannath [-o<

2011-06-22 08:49:35 By Ujjwal Jagnanathji Priya

jay jagnnath jay jagadisha

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श्री जगन्नाथ पुरी मंदिर


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