यदुवंशियो को ऋषियों का श्राप
![]() महाभारत का युद्ध करवाकर भगवान ने पृथ्वी का भार तो कम कर दिया था,पर भगवान ने विचार किया कि यदुवंश मेरे आश्रित है.और जनबल,धनबल, और विशाल वैभव के कारण उच्छृख्ल हो रहा है.और किसी भी प्रकार पराजय नहीं हो सकता.जिस प्रकार बाँस के वन में परस्पर संघर्ष से उत्पन्न अग्नि के समान इस युदुवंश में भी परस्पर कलह खड़ा कराके, मै शांति प्राप्त कर सकूँगा, और इसके बाद अपने धाम में जाऊँगा.
भगवान सर्वशक्तिमान और सत्यसंकल्प है,उन्होंने इस प्रकार अपने मन में निश्चय करके ब्राह्मणों के शाप के बहाने अपने ही वंश का संहार कर डाला.अब भगवान श्रीकृष्ण महाराज उग्रसेन की राजधानी द्वारिकापुरी में वसुदेव जी के घर यादवो का संहार करने के लिये कालरूप से ही निवास कर रहे थे.उस समय – विश्वामित्र, असित, दुर्वासा, भृगु, अंगिरा, कश्यप, वामदेव, अत्रि, वसिष्ठ, नारद, आदि बड़े-बड़े ऋषि द्वारिका के पास ही पिण्ङारक क्षेत्र में जाकर निवास करने लगे थे.
एक दिन यदुवंश के कुछ उद्दण्ड कुमार खेलते-खेलते उनके पास जा निकले,उन्होंने बनावटी नम्रता से उनके चरणों में प्रणाम करके,प्रश्न किया वे जाम्बवतीनंदन साम्ब को स्त्री के वेष में सजाकर ले गये,और कहने लगे-ब्राह्मणों !यह कजरारी आंखोंवाली सुंदरी गर्भवती है यह आप से एक बात पूछना चाहती है आप लोगों का ज्ञान अमोघ है,इसे पुत्र की बड़ी लालसा है आप लोग बताइये यह कन्या जानेगी, या पुत्र? उन कुमारो ने इस प्रकार उन ऋषि-मुनियो को धोखा देना चाहा,तब वे भगवतप्रेरणा से क्रोधित हो उठे उन्होंने कहा-मूर्खो!यह एक ऐसा मूसल पैदा करेगी जो तुम्हारे कुल का नाश करनेवाला होगा वे बालक बहुत डर गये उन्होंने साम्ब का पेट खोलकर देखा तो सचमुच उसमे एक लोहे का मूसल मिला इस प्रकार वे बहुत घबरा गये और उनके मुख कुम्हला गये,उन्होंने भरी सभा में सब यादवो के सामने ले जाकर वह मूसल रख दिया और राजा उग्रसेन को जाकर सारी घटना कह सुनाई.
उग्रसेन ने उस मूसल को चूरा-चूरा करा डाला और उस चूरे और लोहे के बचे हुये टुकडे को समुद्र में फेकवा दिया.उस लोहे के टुकड़े को एक मछली निगल गयी और चूरा तरंगों के साथ बह-बहकर समुद्र के किनारे आ लगा वह थोड़े दिनों में एरक (एक घास)के रूप में उग आया मछली मरने वाले मछुआरो ने समुद्र में दूसरी मछलियों के साथ उस मछली को भी पकड़ लिया उसके पेट में जो लोहे का टुकड़ा था उसको जरा नामक व्याध ने अपने बाण के अपने नोक में लगा लिया.भगवान सबकुछ जानते थे वे इस शाप को उलट भी सकते थे फिर भी उन्होंने ऐसा करना उचित ना समझा कालरुपी भगवान ने ब्राह्मणों के शाप का अनुमोदन ही किया. “जय जय श्री राधे ”
Use following code to Embebd This Article in your website/Blog
Tags :
DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
| ||||||||||||||||||||||||||||||
- अवधूतोपाख्यान १
- अवधूतोपाख्यान २
- अवधूतोपख्यान 3
- नौ योगेश्वरो का संवाद 1
- नौ योगेश्वरो का संवाद 2
- नौ योगेश्वरो का संवाद 3
- नौ योगेश्वरो का संवाद 4
- नौ योगेश्वरो का संवाद 5
- बद्ध, मुक्त और भक्तजनो के लक्षण
- भक्ति योग की महिमा
- भक्तजनों के लक्षण
- ध्यान की विधि
- कर्म और कर्म त्याग की विधि
- लौकिक पारलौकिक भोगो की असारता
- यम-नियमादि साधनों का वर्णन
- सत्संग की महिमा
- यदुवंशियो को ऋषियों का श्राप
- यदुकुल का संहार और भगवान का स्वधाम गमन
to add in radhakripa.
1146 | 0.0 | |
495 | 0.0 | |
897 | 5.0 | |
38 | 5.0 | |
50 | 5.0 |
You are free to use any content from here but you need to include radhakripa logo and provide back link to http://radhakripa.com


