श्री सदन जी
![]() एक सदना नाम के कसाई थे , मांस बेचते थे, पर भगवत भजन में बड़ी निष्ठा थी एक दिन एक नदी के किनारे से जा रहें थे रास्ते में एक पत्थर पड़ा मिल गया.उन्हें अच्छा लगा उन्होंने सोचा बड़ा अच्छा पत्थर है क्यों ना में इसे मांस तौलने के लिए उपयोग करू. उसे उठाकर ले आया.और मांस तौलने में प्रयोग करने लगे.
जब एक किलो तौलते, तो भी सही तुल जाता, जब दो किलो तौलते तब भी सही तुल जाता, इस प्रकार चाहे जितना भी तौलते, हर भार एक दम सही तुल जाता, अब तो एक ही पत्थर से सभी माप करते और अपने काम को करते जाते और भगवन नाम लेता जाता.
प्रसंग १.-एक दिन की बात है उसी दूकान के सामने से एक ब्राह्मण निकले ब्राह्मण बड़े ज्ञानी विद्वान थे उनकी नजर जब उस पत्थर पर पड़ी तो वे तुरंत उस सदना के पास आये और गुस्से में बोले ये तुम क्या कर रहे हो क्या तुम जानते नहीं जिसे पत्थर समझकर तुम तौलने में प्रयोग कर रहे हो वे शालिग्राम भगवान है इसे मुझे दो जब सदना ने यह सुना तो उसे बड़ा दुःख हुआ और वह बोला हे ब्राह्मण देव मुझे पता नहीं था कि ये भगवान है मुझे क्षमा कर दीजिये.और शालिग्राम भगवान को उसने ब्राह्मण को दे दिया.
ब्राह्मण शालिग्राम शिला को लेकर अपने घर आ गए और गंगा जल से उन्हें नहलाकर, मखमल के बिस्तर पर, सिंहासन पर बैठा दिया, और धूप, दीप,चन्दन से पूजा की. जब रात हुई और वह ब्राह्मण सोया तो सपने में भगवान आये और बोले ब्राह्मण मुझे तुम जहाँ से लाए हो वही छोड आओं मुझे यहाँ अच्छा नहीं लग रहा. इस पर ब्राह्मण बोला भगवान ! वो कसाई तो आपको तुला में रखता था जहाँ दूसरी ओर मास तौलता था उस अपवित्र जगह में आप थे.
भगवान बोले - ब्रहमण! आप नहीं जानते, जब सदना मुझे तराजू में तौलता था तो मानो हर पल मुझे अपने हाथो से झूला झूला रहा हो ,जब वह अपना काम करता था तो हर पल मेरे नाम का उच्चारण करता था.हर पल मेरा भजन करता था जो आनन्द मुझे वहाँ मिलता था, वो आनंद यहाँ नहीं.इसलिए आप मुझे वही छोड आये.चाहे वे मास से तौले या पूजा करे ? तब ब्राह्मण तुरंत उस सदना कसाई के पास गया ओर बोला मुझे माफ कर दीजिए.वास्तव में तो आप ही सच्ची भक्ति करते है.ये अपने भगवान को संभालिए.
प्रसंग २. - जब सदना जी ने यह सुना तो प्रेम में मगन हो गए अब तो घर को तजकर प्रभु को ह्रदय में धारण कर शालिग्राम जी को लेकर जगन्नाथ जी के दर्शन को चल दिए. बहुत से यात्री मिले. पर कसाई समझकर सब ने इनसे घ्रणा की. सबके मन का भाव जानकर ये पृथक चलने लगे. मार्ग में एक ग्राम मिला वहाँ एक घर में भिक्षा लेने के लिए गए.उस घर कि स्त्री इनका रूप देखकर कामवश हो गई. और बोली - आप आज यही भोजन कर ले.जब सदना जी रुक गए तो रात्री में बोली - में आप पर रीझ गई हूँ, आप मुझे अपने साथ ले चलो. सदना जी ने कहा - तू गला भी काट डाले, तो भी मै तुझसे प्रेम नहीं कर सकता.
उस दुष्ट स्त्री ने कुछ और ही समझा और अपने पति का गला काट डाला और कहने लगी- कि अब तो मुझे अपने संग ले चलो
सदना जी ने कहा - मै तो पहिले ही इनकार कर चूका हूँ मेरा तुझसे क्या सम्बन्ध?
अब तो उस स्त्री को बहुत गुस्सा आया वह जोर जोर से रोने लगी और कहने लगी कि इस व्यक्ति ने मेरे पति को मार डाला और जबरदस्ती मुझे अपने साथ ले जा रहा है. गाँव वाले उसकी आवाज सुनकर आ गए और सदना से पूंछा - तो उन्होंने कहा हाँ! मैंने ही मारा है. पर गाँव वालो को उनके भक्ति लक्षण देखकर यकीन नहीं हुआ और उनके हाथ कटवाकर छोड दिया
हाथ कटने पर जगन्नाथ जी के दर्शन को चल दिए मन में जरा भी मलिनता नहीं आने दी . और सोचा कि मेरे कोई पूर्व जन्म का पाप है जिसका फल मुझे मिला.
श्री जगन्नाथ भगवान ने विप्र रूप से बताया कि पूर्वजन्म में आप काशी में पंडित थे. एक दिन एक गौ, एक कसाई के घर से भागी जाती थी. पीछे कसाई दौड रहा था. जब उसने आपसे पूंछा कि गाय को देखा है तो आपने हाथो से बता दिया. वही गाय यह स्त्री हुई और वही कसाई उसका यह पति जिसको पूर्वजन्म के कर्म के कारण, उसने गला कटा और उसी दोष से तुम्हारा हाथ काटे गए पाप का कर्म फल तो आपको भोगना ही था,पर में अपने भक्तो को पाप से छुडा लेता हूँ.
जगन्नाथ जी ने सदना को लेने के लिए पालकी भेजी. पालकी लेकर आये पण्डे ने कहा - आप विचार मत करे! पालकी में बैठ जाये, और ज्यो ही पालकी मै बैठे, हाथ ज्यो के त्यों हो गए. और भगवान ने कहा - तुमने यथार्थ कसौटी दे दी है, तुम परीक्षा में पास हो गए हो, अब आनंदपूर्वक भक्ति करो.
"जय जय श्री राधे "
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