मीरा बाई जी
![]() मीरा बाई का परिचय - उनका जन्म 1504 ईस्वी में जोधपुर के पास मेढता ग्राम मे हुआ था, जोधपुर के राठौड़ रतनसिंह जी की इकलौती पुत्री थी, मीराबाई के बाल मन में कृष्ण की ऐसी छवि बसी थी कि यौवन काल से लेकर मृत्यु तक मीरा बाई ने कृष्ण को ही अपना सब कुछ माना. बचपन से ही वे कृष्ण-भक्ति में रम गई थीं.
प्रसंग १- ऐसा कहा जाता है कि मीरा जी पूर्व जन्म में वृंदावन की एक गोपी थी जिनका विवाह एक गोप से हुआ,विवाह के पश्चात भी इनका कृष्ण प्रेम कम नहीं हुआ जब गोपी कि सास को पता चला तो उन्होंने कृष्ण से मिलने नहीं दिया और कमरे में बंद कर दियावे उन्हें कृष्ण से मिलने नहीं देती थी कृष्ण मिलन की तड़प ऐसी की सी समय गोपी ने अपनाशरीर छोड दिया कहते है वही गोपी मीरा बाई के रूप में आई .
प्रसंग – २. एक बार की बात है जब मीराबाई छोटी थी तब एक दिन उनके पड़ोस में किसी बड़े आदमी के यहां बारात आई थी. सभी स्त्रियां छत से खड़ी होकर बारात देख रही थीं. मीराबाई भी बारात देख रही थीं, बारात को देख मीरा ने अपनी माता से पूछा कि मेरा दूल्हा कौन है? इस पर मीराबाई की माता ने कृष्ण की मूर्ति के तरफ इशारा कर कह दिया कि वही तुम्हारे दुल्हा हैं. यह बात मीरा बाई के बालमन में एक गांठ की तरह बंध गई. उनका विवाह उदयपुर के महाराणा सांगा के पुत्र कुंवर भोजराज के साथ हुआ. विवाह के कुछ समय बाद ही उनके पति का देहान्त हो गया. पति की मृत्यु के बाद उन्हे पति के साथ सती करने का प्रयास किया गया किन्तु मीरां इसके लिये तैयार नही हुई .वे संसार की ओर से विरक्त हो गयीं और साधु-संतों की संगति में हरिकीर्तन करते हुए अपना समय व्यतीत करने लगीं.
"ऐसी लगी लगन मीरा हो गई मगन, वो तो गली-गली हरि गुण गाने लगी, महलों में पली, बनके जोगन चली, मीरा रानी दीवानी कहाने लगी कोई रोके नहीं, कोई टोके नहीं, मीरा गोविंद गोपाल गाने लगी बैठी संतो के संग, रंगी मोहन के रंग ,मीरा प्रेमी प्रियतम को मनाने लगी राणा ने विष दिया, मानो अमृत दिया,मीरा सागर में सरिता समाने लगी, दुःख लाखो सहे, मुख से गोविंद कहे, मीरा गोविंद गोपाल गाने लगी"
मीरा के कहने पर राजा महल में ही कृष्ण मंदिर बनवा देते हैं. महल में भक्ति का ऐसा वातावरण बनता है कि वहां साधु-संतों का आना-जाना शुरू हो जाता है. मीरा के देवर राणा जी को यह बुरा लगता है. लेकिन मीरा दीन-दुनिया भूल कृष्ण में रमती जाती हैं
मीराबाई का कृष्णभक्ति में नाचना और गाना राज परिवार को अच्छा नहीं लगा। उन्होंने कई बार मीराबाई को विष देकर मारने की कोशिश की.कभी विष देकर तो कभी सांप का पिटारा भेज कर पर भगवान का प्रसाद समझकर मीरा जी ने स्वीकार कर लिया और विष का उन पर कोई असर नहीं हुआ और सांप की पिटारी खोलते ही शलिग्राम भगवान निकले .
"मीरा थी ऐसी मतवाली , विष पी गयी बजाकर ताली
"घर तजू, वन तजू, नागर-नगर तजू, वंशीवट तट तजू, काहू पे ना लज हो,ये देह तजू, गेह तजू, पर नेह कहो कैसे तजू, आज सारे राज बीच ऐसे साज सज हो,ये बाबरो भयो है लोक, बाबरी कहे मोको, ऐरी! बाबरी कहेते पे मै, काहू न बरज हो, कहैया-सुनैया तजू, बाप और भईया तजू, दईया तजू, मईया, पे कन्हैया ना ही तज हो.” मीरा जी ने इस भाव को सार्थक किया,जब देह आसक्ति समाप्त हो गई तब घर क्या वन क्या सब की नजर में मेरा यह लोक और परलोक बिगड गया पर इस लोक और परलोक की परवाह किसे है.लोग मुझे बाबरी कहते है पर ऐसा कहाने पर में किसी पर नहीं बरजूगी,कहईया, सुनाईया,मै सबको भूल गई क्योकि सब कुछ ही तो भूलना है. मीरा वृंदावन में भक्त शिरोमणी जीव गोस्वामी के दर्शन के लिये गईं. गोस्वामी जी सच्चे साधु होने के कारण स्त्रियों को देखना भी अनुचित समझते थे. उन्होंने अन्दर से ही कहला भेजा कि हम स्त्रियों से नहीं मिलते, इस पर मीराबाई का उत्तर बडा मार्मिक था. उन्होने कहा कि वृन्दावन में श्रीकृष्ण ही एक पुरुष हैं, यहां आकर जाना कि उनका एक और प्रतिद्वंदी हो गया है. मीरा का ऐसा मधुर और मार्मिक उत्तर सुन कर जीव गोस्वामी नंगे पैर बाहर निकल आए और बडे प्रेम से उनसे मिले. मीराबाई रैदास को अपना गुरु मानते हुए कहती हैं -
"गुरु मिलिया रैदास दीन्ही ज्ञान की गुटकी" मीराबाई ने चार ग्रंथों की रचना की–
इसके अलावा मीराबाई के गीतों का संकलन “मीराबाई की पदावली" नामक ग्रन्थ में किया गया है.
"जय जय श्री राधे "
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