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कुम्भनदास जी

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कुंभनदास अष्टछाप के एक कवि थे. ये पूरे विरक्त और धन, मान, मर्यादा की इच्छा से कोसों दूर थे. ये मूलत: किसान थे.  कुम्भनदास जी ने महाप्रभु वल्लभाचार्य  से दीक्षा ली थी.  दीक्षित होने के बाद श्रीनाथजी के मंदिर में कीर्तन किया करते थे. ये किसी से दान नहीं लेते थे.इन्हें मधुरभाव की भक्ति प्रिय थी और इनके रचे हुए लगभग 500 पद उपलब्ध हैं.

 

परिवार में इनकी पत्नी के अतिरिक्त सात पुत्र, सात पुत्र-वधुएँ और एक विधवा भतीजी थी. अत्यन्त निर्धन होते हुए भी ये किसी का दान स्वीकार नहीं करते थे. राजा मानसिंह ने इन्हें एक बार सोने की आरसी और एक हज़ार मोहरों की थैली भेंट करनी चाही थी परन्तु कुम्भनदास ने उसे अस्वीकार कर दिया था. अपनी खेती के अन्न, करील के फूल और टेटी तथा झाड़ के बेरों से ही पूर्ण सन्तुष्ट रहकर ये श्रीनाथजी की सेवा में लीन रहते थे. ये श्रीनाथजी का वियोग एक क्षण के लिए भी सहन नहीं कर पाते थे.


 

प्रसंग १. -  एक बार अकबरने इन्हें फ़तेह पुर सीकरीबुलाया था. सम्राट की भेजी हुई सवारी पर न जाकर ये पैदल ही गये और जब सम्राट ने इनका कुछ गायन सुनने की इच्छा प्रकट की तो इन्होंने गाया'-

 

"भक्तन को कहा सीकरी सों काम

आवत जात पनहिया टूटी बिसरि गयो हरि नाम

जाको मुख देखे दुख लागे ताको करन करी परनाम

कुम्भनदास लाला गिरिधर बिन यह सब झूठो धाम."

 

अकबर को विश्वास हो गया कि कुम्भनदास अपने इष्टदेव को छोड़कर अन्य किसी का यशोगान नहीं कर सकते फिर भी उन्होंने कुम्भनदास से अनुरोध किया कि वे कोई भेंट स्वीकार करें, परन्तु कुंभन दास ने यह माँग की कि आज के बाद मुझे फिर कभी न बुलाया जाय.

 

प्रसंग २. - कुंभनदास के सात पुत्र थे. परन्तु गोस्वामी विट्ठलनाथ के पूछने पर उन्होंने कहा था कि वास्तव में उनके डेढ़ ही पुत्र हैं क्योंकि पाँच लोकासक्त हैं, एक चतुर्भुज दास भक्त हैं और आधे कृष्णदास हैं, क्योंकि वे भी गोवर्धन नाथ जी की गायों की सेवा करते हैं.

 

एक बार कृष्णदास को जब गायें चराते हुए सिंह ने मार डाला था, तो कुम्भनदास यह समाचार सुनकर मूर्च्छित हो गये थे, परन्तु इस मूर्च्छा का कारण पुत्र–शोक नहीं था, बल्कि यह आशंका थी कि वे सूतक के दिनों में श्रीनाथजी के दर्शनों से वंचित हो जायेंगे. भक्त की भावना का आदर करके गोस्वामी जी ने सूतक का विचार छोड़कर कुम्भनदास को नित्य-दर्शन की आज्ञा दे दी थी. और कहा कि जिसके लिए भगवान ही सब कुछ है पुत्र मोह आसक्ति नहीं, जो भगवान का ऐसा भक्त है उसके लिए कौन सा और कैसा सूतक,

 

कुम्भनदास को निकुंजलीला का रस अर्थात् मधुर-भाव की भक्ति प्रिय थी और इन्होंने महाप्रभु से इसी भक्ति का वरदान माँगा था. अन्त समय में इनका मन मधुर–भाव में ही लीन था, क्योंकि इन्होंने गोस्वामीजी के पूछने पर इसी भाव का एक पद गाया था. पुन: पूछने पर कि तुम्हारा अन्त:करण कहाँ है, कुम्भनदास ने गाया था-

 

"रसिकिनि रस में रहत गड़ी

कनक बेलि वृषभान नन्दिनी स्याम तमाल चढ़ी

विहरत श्री गोवर्धन धर रति रस केलि बढ़ी" 

 

"जय जय श्री राधे "


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!! जय जय श्री राधे !!
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Comments
2013-03-01 07:54:38 By Arun Bhardwaj

HARI HARI

2011-12-21 11:39:53 By manoj jaswal

jai shri radhe

2011-05-21 12:04:54 By Rakesh Sharma

जय जय श्री राधे !

2011-05-03 07:48:50 By ??? ???????

जय जय श्री राधे ! धन्य हैं ऎसे प्रभुभक्त!

2011-04-14 07:15:00 By KAILASH CHANDRA SHARMA

NIKUNJ ME VIRAJE GHANSHYAM RADHE RADHE/ GGHANSHYAM RADHE GHANSHYAM RADHE/ KUMBHAN HRIDAY BIRAJE , KUMBHAN HRIDAY SAJE/ GHANSHYAM RADHE , GHANSHYAM RADHE/ NIKUNJ ME VIRAJE ,GHANSHYAM RADHE//

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