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Pandit Ji

कालिदास जी

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“भक्त-पद-रज” “भक्त-पादोदक” और “भक्तोच्छिष्ट द्रव्य” इन तीनो का अत्यन माहात्म्य है सचमुच जिन्हे इन तीनो वस्तुओ में पूर्ण श्रद्धा हो गयी, जिनकी बुद्धि में से भक्तो के प्रति भेदभाव मिट गया, जो भगवत्स्वरूप समझकर सभी भक्तो की पदधूली को श्रद्धा पूर्वक सिर पर चढाने लगे,तथा भक्तो के पादोदक को भक्तिभाव से पान करने लगे,वे निहाल हो गये.

 

कालिदास जी भी ऐसे भक्त थे, कालिदास जी चैतन्य कालीन भक्त थे, ये जाति के कायस्थ थे. भगवन्नाम में इनकी अनन्य निष्ठा थी, उठते-बैठते, सोते-जागते, हँसते-खेलते तथा बाते करते-करते भी सदा जीव्हा पर भगवन् नाम ही विराजमान रहता हरे कृष्ण, हरे राम, के बिना ये किसी से बात ही नहीं करते थे. 

 

किसी भी भगवत् भक्त का पता पाते वही दौड़ जाते, और यथाशक्ति सेवा करते, भक्तो को खिलाकार उनका उच्छिष्ट महाप्रसाद को पाकर ये अपने को कृतार्थ समझते, भक्तो का पादोदक पान करना उनकी पदधूली को मस्तक पर चढाना, ये ही इनके साधन बल है ! इसके अतिरिक्त ये योग, यज्ञ, तप, पूजा, पाठ, अध्ययन आदि कुछ भी नहीं करते थे ! ऐसा ही इनका द्रृढविश्वास था, कि इन्ही साधनों के द्वारा प्रभु पदों की प्रीति प्राप्त हो जायेगी.  

 

प्रसंग १.- एक बार इनके गाँव में ही एक शूद्र जाति के भक्त थे उनकी पत्नि भी अत्त्यन्त पतिपरायणा सती साध्वी नारी थी, दोंनो ही खूब भक्तिभाव से श्रीकृष्णकीर्तन किया करते थे, एक दिन कालिदास जी उनके दर्शन के निमित्त उनके घर गये. और भेंट के रूप में आम साथ ले गये,उन्हे आया देख दोनो पति-पत्नि के आश्चर्य का ठिकाना ही ना रहा दोनों ने उनका स्वागत किया और एक फटा आसन बैठने को दिया और बड़े लल्जित भाव से भक्त बोला- आपने अपनी पदधूलि से इस गरीव की कुटिया को पवित्र बना दिया . हम तो शुद्र है, आपकी किस प्रकार सेवा करे.

 

कालिदास जी ने कहा – यदि आप कृपा करके कुछ करना चाहते है तो अपने चरणो को मेरे मस्तक पर रखकर उनकी पावन पराग से मेरे मस्तक को पवित्र बना दीजिये. मुझे सब कुछ मिल जायेगा, वह भक्त बोला - आप ये कैसी भूली-भूली बाते कर रहे हो, हम जाति के शूद्र, धर्म-कर्म से हीन आपके शरीर को स्पर्श करने तक के अधिकारी नहीं, फिर हम आपको अपने पैर कैसे छुआ सकते है हमारी यही प्रार्थना है कि ऐसी पाप चढाने वाली बात फिर आप कभी अपने मुँह से ना निकले.

 

कालिदास जी ने कहा - जो भगवान का भक्त है, उसकी कोई जाति नहीं होती उससे श्रेष्ठ कोई नहीं होता वही सबसे श्रेष्ठ है, आपकी चरणी धूलि से में पावन हो जाऊँगा,आप मेरे ऊपर अवश्य कृपा करे. वे बहुत देर तक आग्रह करते रहे, पर उन्होंने स्वीकार नहीं किया. अंत में दोनों पति-पत्नि ने उन्हे विदा किया, वह भक्त उन्हे बाहर तक छोडकर घर लौट आये, जब वह भक्त घर में घुस गये तब जिस स्थान पर वह भक्त खड़े थे उस स्थान की चरण धूलि उठाकर कालिदास जी ने अपने सम्पूर्ण शरीर पर लगा ली और घर के बाहर छिपकर बैठ गये रात्रि का समय था,

 

उस भक्त की पत्नि ने कहा - कालिदास जी, ये प्रसादी आम देकर गये थे उन्हे भगवान को अर्पण करके पा लो, भक्त का दिया प्रसाद है इसे पाने से कोटि जन्म के पाप कटते है भगवान को अर्पण करके भक्त उन्हे चूसने लगे उनके चूसने के बाद जो बचता उनकी पतिव्रता स्त्री चूसती जाती और गुठली और छिलके को बाहर की ओर फेकती जाती, पीछे छुपे कालिदास जी उन गुठलियों को उठाकर चूसते और उनमे वे अमृत के समान स्वाद का अनुभव करते ! इस प्रकार की इनकी भक्तो के प्रति अनन्य श्रद्धा थी.

 

प्रसंग २.- एक बार गौडीय भक्तो के साथ ये भी नीलाचल में प्रभु के दर्शन के लिए पधारे. महाप्रभु जब जगन्नाथ जी के दर्शन के लिए जाते तब सिह द्वार के समीप एक गड्डे में पैर धोया करते थे गोविंद उनके साथ ही जाता था प्रभु ने कठोर आज्ञा दे रखी थी कि यहाँ हमारे पादोदक को कोई भी पान न करे इसलिए वहाँ जाकर प्रभु का पादोदक पान करने का साहस किसी को भी नहीं था.

 

परन्तु भक्तो का पादोदक और भक्त भुक्त अन्न ही जिनके साधन का एकमात्र बल है वे कालिदास भला कब मानने वाले थे वे निर्भीक होकर प्रभु के समीप चले गए और उनके पैर धोए हुए जल को पीने लगे, एक चुल्लू पिया, प्रभु चुपचाप उनके मुख कि ओर देखते रहे, दूसरा चुल्लू पिया, प्रभु थोडा मुस्कुराये, तीसरा चुल्लू पिया, प्रभु जोर से हँसने लगे, चौथे चुल्लू के लिए जैसे ही हाथ बढ़ाया प्रभु ने हाथ पकड़ लिया.और कहने लगे - बस! बहुत हुआ, अब फिर कभी ऐसा साहस न करना. फिर महाप्रभु का उच्छिष्ट अन्न कि प्रसादी पाई, पादोदक के अनंतर प्रसाद पाकर उनकी प्रसन्नता का पारावार नहीं रहा धन्य है ऐसे भक्त.  

सार -

सच है जिन्होंने सब कुछ त्याग दिया ऐसे परम पूज्य भगवद्ध महापुरुषो के चरणो के नीचे की धूलि को जब तक सर्वाग में लगाकर उसमे स्नान ना किया जाये तव तक किसी को भी प्रभु पादपदों की प्राप्ति नहीं हो सकती.                                                  

“ जय-जय श्री राधे ”


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Comments
2013-03-01 08:31:04 By Arun Bhardwaj

HAR BOL

2011-05-21 12:06:02 By Rakesh Sharma

जय जय श्री राधे !

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भक्त चरित्र


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