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Pandit Ji

श्री जयदेव जी

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श्री जयदेव जी का जन्म "किन्दुबिल्व" नाम के ग्राम में हुआ भोजदेव इनके पिता और राधादेवी इनकी माता थी. ये ब्राह्मण कुल के थे. और वैराग्य तो ऐसा कि ग्रह त्याग के वन में भी एक वृक्ष के तले एक दिवस से ज्यादा नहीं ठहरते और निर्वाह के लिए केवल एक गुदड़ी थी और के कमंडलु था.

जयदेव जी द्वारा रचित "श्री गीतगोविन्द" काव्य के सम्पूर्ण अंगों का, नवो रसो का, सरसश्रृंगार का रत्नाकर समुद्र ही है.गीत गोविंद कि अष्ट पदियाँ जो कोई अभ्यास करता है उसकी बुद्धि को बढती है.जो सप्रेम गान करता है तो श्री राधा वल्लभ जी वहाँ सुनने के लिए प्रसन्न होकर प्रकट या गुप्त रूप से अवश्य ही आते है.


प्रसंग १- एक बार एक ब्राह्मण श्री जगन्नाथ को अपनी कन्या प्रतिज्ञापूर्वक देने को कह गया जब वह लडकी अवस्था में उस योग्य हुई तो उसको देने के लिए वह विप्र श्री जगन्नाथ जी के पास लाया प्रभु कि आज्ञा हुई कि जयदेव जी नामक भक्त मेरे ही स्वरुप है सो आप इसी क्षण ले जाके और मेरी आज्ञा उनसे उसको अपनी बेटी उन्ही को दे दो.

जयदेव जी उस ब्राह्मण की कन्या ने बोले तुम अपने योग्य और निर्वाह आदि को विचार करो और जैसा उचित है.वैसा करो ब्राह्मण अपनी कन्या को लेकर जहाँ कवी राज जयदेव जी बैठे हुए प्रभु का स्मरण कर रहे थे वही जाकर प्रार्थना करने लगे कि महाराज यह मेरी कन्या है और मै आपको अर्पण करता हूँ इसका कर ग्रहण कीजिये.

इन्होने कहा – जो अधिकारी हो और गृहस्थाश्रम का विस्तार करे उसे दीजिये .ब्राह्मण ने कहा – जो अपनी इच्छा से करता तो विभव विचार अवश्य करता परन्तु मै तो श्री जगन्नाथ जी कि आज्ञा से आपको कन्या दे रहा हूँ.पर इन्होने स्वीकार नहीं किया.तब ब्राह्मण ने अपनी अपनी कन्या से कहा कि तू इन्ही के पास बैठ रह क्योकि श्री जगन्नाथ जी की आज्ञा मुझसे टारी नहीं जाती. ऐसा कह कन्या को बिठलाकर ब्राह्मण चल दिए .


पद्मावती जी बोली – में तो पिता के देने से और प्रभु आज्ञा से आपको श्री जगन्नाथ ही जान अपना सर्वस्व न्यौछावर कर आपकी हो चुकी.तब कुटिया बनाकर रहने लगे.


एक बार प्रभु प्रेरणा से ह्रदय में आया कि मै प्रभु चरित्र मय एक नवीन पुस्तक बनाऊँ तब श्री गोविंद जी का अति सरस गीत श्री गीत गोविंद प्रकट हुआ.
जब जयदेव गीत गोविन्द लिख रहे थे तो एक प्रसंग उन के हृदय में आया- “स्मर-गरल-खंडन, ममशिरसि मंड़न देहि पदपल्लवमुदाराम”,

अर्थात भगवान राधा जी से कह रहे है - हे प्रिय ! कन्दर्प का विष खंडन करने वाला, और मेरे मस्तक का मेरे मस्तक का मंडल भूषण अपने चरण कमलों को मेरे शिर पर रखो’ लेकिन जयदेव जी को इस प्रसंग पर शंका हुई और इसे बीच में अधूरा छोड़ कर विचार करते हुए आप स्नान करने चले गए. जब वापिस आ कर देखा तो अचंभित रह गए की जैसा उन्होंने सोचा था वैसा ही श्लोक लिखा हुआ पाया . पत्नी से पूछा तो पत्नी ने बताया की आप खुद ही आए थे और इसे लिखकर वापिस स्नान करने चले गए. इस पर जयदेव जी समझ गए की स्वयं भगवान यह पंक्तियाँ लिख कर गए हैं.


प्रसंग २-
संयोग से उडीसा के राजा सात्विक ने गीत गोविन्द के जैसी, उसी विषय पर आधारित एक अच्छी कविता लिखी. उस कविता को उसने ब्राह्मणों को उन की प्रतिक्रिया जानने को दिया. ब्राह्मणों ने राजा को उसी विषय पर जयदेव का रचा गीत गोविन्द दिखाया और राजा की कविता की त्रुटियाँ बताते हुए आलोचना की . परन्तु राजा अपने अभिमान के कारण अपनी रचना को कम मानने को तैयार नहीं था. समाधान के लिये उसने अपनी और जयदेव की रचना को मंदिर की मूर्ति के सामने फैसला करने के लिये रख दिया. 


मूर्ति ने जयदेव की रचना को ग्रहण किया माला तुरंत जयदेव जी रचना पर लिपट गई और राजा की रचना को नकार दिया. लज्जित होकर राजा ने आत्महत्या करने का निश्चय किया. इस पर भगवान राजा के समक्ष प्रगट होकर बोले –कि राजन ! जयदेव की रचना निश्चित ही तुम से श्रेष्ट है लेकिन तुम्हारी रचना भी सराहनीय है इसलिए जयदेव के गीत गोविंद के साथ साथ तुम्हारे भी द्वाश श्लोक चलेगे. और ऐसा ही किया गाया.


प्रसंग ३- एक दिन एक माली कि बेटी बैगन के बारे में बैगन तोडती हुई श्री गीतगोविंद के पंचम सर्ग की कथा का एक पद गा रही थी - “ना कुरु नितम्बिनि गमन विलम्बनमनुसर तं ह्र्दयेशम् || धीर समीरे यमुना तीरे वसति वने वनमाली “  
अर्थ – "दुति श्री राधिका जी से कहती है कि हे नितम्बिनि! अब गमन में विलम्ब मत करो उन प्राणप्रिया के समीप चलो वे वनमाली वन विषे यमुना के कूल में धीर समीर कुंज में बसते है"  इसी पद को सुनते हुए उस माली कि सुता के पीछे-पीछे श्री जगन्नाथ जी निज अंग में झीना जामा पहिने फिरते डोलने लगे. और जब वह तान छेडती तो तब प्रेम मादकता से झूमते 'बहुत अच्छा' कहते थे.

जब कन्या घर चली गई तब बैगन के कंटको से झंगा फट गया फिर मंदिर आये पुजारी जी ने पट खोला तो देखा श्री जगन्नाथ जी के वस्त्र फटे है पांडा से पूंछा – पांडा जी ने कहा - हमें नहीं पता कैसे वस्त्र फटे ! तब प्रभु ने ही स्वयं जनाया-  कि एक कन्या के बैगन की बारी में गाती थी.हम सुनते थे इससे वस्त्र फटे .हमको वह कथा अति प्रिय है. “अर्थात उसको बुलाके गवाओ” तब उस कन्या को लाए और उसने प्रभु को प्रसन्न किया.


प्रसंग ४- एक बार वे यात्रा को निकले।संत सेवा के लिए अन्न घृत आदि सामग्री लेने के लिए स्वर्णमुद्राएँ,गाँठ में बंधे गाँव को चल पड़े। जब वे घने जंगल में पहुँचे तब कुछ डकैतों ने उन पर पीछे से आक्रमण किया और उनका सब सामान छीनकर हाथ-पैर काटके उन्हें कुएँ में धकेल दिया। कुएँ में अधिक पानी तो था नहीं, घुटने भर पानी !दलदल  में क्या डूबते, वहाँ ऐसे गिरे जैसे गद्दी पर पड़ जायें।


जयदेव जी बोलते हैं- "गोविन्द ! यह भी तेरी कोई लीला है। तेरी लीला अपरम्पार है !" इस प्रकार कहते हुए वे भगवन्नाम गुनगुना रहे थे। इतने में गौड़ देश के राजा लक्ष्मणसेन वहाँ से गुजरे। कुएँ में से आदमी की आवाज आती सुनकर राजा ने देखने की आज्ञा दी। सेवक ने देखा तो कुएँ में जयदेव जी भजन गुनगुना रहे हैं। राजा की आज्ञा से उन्हें तुरंत बाहर निकाला गया।


राजा ने पूछा-
 "महाराज ! आपकी ऐसी स्थिति किस दुष्ट ने की ? आपके हाथ-पैर किसने काटे ? आज्ञा कीजिये, मैं उसे मृत्युदंड दूँगा।"


उन ज्ञानवान महापुरूष ने कहा-  "कुछ नहीं, जिसके हाथ-पैर थे उसी ने काटे।इस प्रसंग को महानुभाव लोग इस प्रकार कहते है कि कि श्री जगन्नाथ जी ने अपने वर्तमान विग्रह कि सद्रश्यता कराके लोक को दिखाके फिर अच्छा कर दिया.


राजा उन्हें अपने महल में ले गये। वैद्य हकीम आये, जो कुछ उपचार करना था किया.
बात पुरानी हो गयी। राजा को सूझा कि यज्ञ किया जाये, जिसमें दूर-दूर के संत-भक्त आयें, जिससे प्रजा को संतों के दर्शन हों, प्रजा का मन पवित्र हो, भाव पवित्र हों, विचार पवित्र हों। कर्म और उज्जवल हों, भविष्य उज्जवल हो।यज्ञ का आयोजन हुआ। जयदेव जी को मुख्य सिंहासन पर बिठाया गया। अतिथि आये। भंडारा हुआ, सबने भोजन किया। उन्हीं चार डकैतों ने सोचा, 'साधुओं के भंडारे में साधुवेश धारण करके जाने से दक्षिणा मिलेगी।' इसलिए वे साधु का वेश बनाकर वहाँ आ पहुँचे।


अंदर आकर देखा तो स्तब्ध रह गये, 'अरे ! जिसका धन छीनकर हाथ पैर काट के हमने कुएँ में फेंका था, वही आज राजा से भी ऊँचे आसन पर बैठा है ! अब तो हमारी खैर नहीं। क्या करें ? वापस भी नहीं जा सकते और आगे जाना खतरे से खाली नहीं है....'

 

इतने में जयदेवजी की नजर उन साधुवेशधारी डाकुओं पर पड़ी। उनकी ओर इशारा करते हुए वे बोलेः "राजन् ! ये चार हमारे पुराने मित्र हैं। इनकी मुझ पर बड़ी कृपा रही है। मैं इनका एहसान नहीं भूल सकता हूँ। आप मुझे जो कुछ दक्षिणा देने वाले हैं, वह इन चारों मित्रों को दे दीजिए।"


डकैत काँप रहे हैं कि हमारा परिचय दे रहे हैं, अब हमारे आखिरी श्वास हैं लेकिन जयदेव जी के मन में तो उनके लिए सदभावना थी।
राजा ने उन चारों को बड़े सत्कार से चाँदी के बर्तन, स्वर्णमुद्राएँ, मिठाइयाँ, वस्त्रादि प्रदान किये। जयदेव जी ने कहाः "मंत्री ! इन महापुरूषों को जंगल पार करवाकर इनके गन्तव्य तक पहुँचा दो।"


जाते-जाते मंत्री को आश्चर्य हुआ कि ये चार महापुरुष कितने बड़े हैं ! मंत्री ने बड़े आदर से पूछाः "महापुरूषो ! गुस्ताखी माफ हो, आपके लिये जयदेवजी महाराज इतना सम्मान रखते हैं और राजा ने भी आपको सम्मानित किया, आखिर आपका जयदेव जी के साथ क्या संबंध है ?"


उन चार डकैतों ने एक दूसरे की तरफ देखा, थोड़ी दूर गये और कहानी बनाकर बोलेः "ऐसा है कि जयदेव हमारे पुराने साथी हैं। हम लोग एक राज्य में कर्मचारी थे। इन्होंने ऐसे-ऐसे खजाने चुराये कि राजा ने गुस्से में आकर इनको मृत्युदंड देने की आज्ञा दे दी, लेकिन हम लोगों ने दया करके इन्हें बचा लिया और हाथ-पैर कटवाकर छोड़ दिया।हम कहीं यह भेद खोल न दें, इस डर से इन्होंने हमारा मुँह बन्द करने के लिए स्वागत कराया है।"


देखो, बदमाश लोग कैसी कहानियाँ बनाते हैं ! कहानी पूरी हुई न हुई कि सृष्टिकर्ता से सहन नहीं हुआ और धरती फट गयी, वे चारों उसमें धँसने लगे और बिलखते हुए घुट घुट के मर गये। मंत्री दंग रह गया कि ऐसे भी मृत्यु भी होती है ! उनको दी हुई दक्षिणा, सामान आदि वापस लाकर राजा के पास रखते हुए मंत्री ने पूरी घटना सुना दी।


राजा ने जयदेव जी को चकित मन से सब बातें बतायीं। महाराज दोनों कटे हाथ ऊपर की तरफ करके कहने लगेः "हे ईश्वर ! बेचारों को अकाल मौत की शरण दे दी !" उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। ईश्वर को हुआ की ऐसे जघन्य पापियों के लिए भी इनके हृदय में इतनी दया है! तो ईश्वर का अपना दयालु स्वभाव छलका और जयदेव जी के कटे हुए हाथ-पैर फिर से पूर्ववत् हो गये। राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ।


उसने बड़े ही कौतूहल से आग्रहपूर्वक पूछाः "महाराज ! अब असलियत बताइये, वे कौन थे ?"


अब जयदेव जी को असलियत बतानी पड़ी। पूर्व वृत्तांत बताकर उन्होंने कहाः "राजन् ! मैंने सोचा कि ' इनको पैसों की कमी है, इसलिए बेचारे इतना जघन्य पाप करते हैं। न जाने किन योनियों में इस पाप का फल भुगतना पड़ेगा ! इस बार आपसे खूब दक्षिणा, धन दिला दूँ ताकि वे ऐसा जघन्य पाप न करें।' क्योंकि कोई भी पापी पाप करता है तो कोई देखे चाहे न देखे, उसे उसका पाप कुतर-कुतर करके खाता है। फिर भी ये पाप से नहीं बचे तो
सृष्टिकर्ता से सहा नहीं गया, ईश्वरीय प्रकोप से धरती फटी, वे घुट मरे।''


रानी द्वारा पद्मावती की परीक्षा

इस घटना के बाद जयदेव ने राजा से कहा -कि उन्हें घर की याद आ रही है और वह अब घर जाना चाहते हैं. राजा ने आप को नगर में ही रहने की बनती की और जयदेव जी की पत्नी पद्मावती को भी जा कर ले आए. पाद्मावती महल में रहने लगीं और रानी उन की सेवा करती थी.


एक दिन रानी अपने भाई की मृत्यु पर उन के साथ सती हुई उस की पत्नी की प्रशंसा कर रही थी तो पद्मावती मुस्कराने लगीं रानी ने जब आप से कारण पूछा तो पद्मावती ने कहा - कि रानी सच्ची सती तो वह है जो पति की मृत्यु की खबर सुन कर ही शरीर त्याग दे. इस पर रानी ने पद्मावती की परीक्षा लेने की सोची.


एक समय जब जयदेव जी किसी काम से बाहर गए हुए थे तो रानी का एक सेवक दौड़ा हुआ आया और पद्मावती से बोला की जयदेव जी जंगल से गुजर रहे थे तो एक शेर उन्हें खा गाया. इतना सुनते ही पद्मावती मृत के समान जमीन पर गिर गई. रानी को अपने किये पर बहुत ही पछतावा हुआ. जब राजा को इस बात का पता चला तो वह रानी पर बहुत कुपित हुआ. रानी ने चिता बनाकर खुद को दहन करने का फैसला किया.

उधर सारी खबर जयदेव को मिली तो उन्होंने आकर रानी को ऐसा करने से रोका. जयदेव जी पद्मावती के मृत शरीर के पास जा कर अष्टपदी गाने लगे पद्मावती जी उठ कर बैठ गई और जयदेव जी के साथ अष्टपदी गाने लगी. सभी के खुशी की कोई सीमा न रही .इसके बाद जयदेव और पद्मावती बंगाल में अपने घर आकर रहने लगे.


प्रसंग ५- जयदेव जी के आश्रम से गंगा जी अठारह कोस दूर थी परन्तु प्रभु कृपा से नित्य ही गंगा स्नान करते थे. जब इनका शरीर वृद्ध हो गया तब भी गंगा स्नान का नियम नहीं छोड़ा ऐसा प्रेम देख गंगा जी को दया लगी.इसलिए गंगा जी ने इन्हें रात्रि में आज्ञा दी कि अब वृद्ध शरीर से नित्य स्नान को मत जाईये इस हठ को छोड कर ध्यान ही से मेरा स्नान किया करो परन्तु बात नहीं मानी तब गंगा जी ने कहा कि देखो तुम्हारे आश्रम के निकट की नदी में ही मै आऊँगी उसी में स्नान किया करो.

जयदेव जी ने पूछा – मै कैसे जानू की आप आई हो ?


श्री गंगा जी ने कहा – देखो उसमे कमल नहीं है अब जब सुन्दर कमल के फूल देखो तो जानना कि मै आ गई हूँ .जयदेव जीने दूसरे दिन देखा तो तो दिव्य कमल फूले थे .और जल भी दिव्य गंगा जल के तुल्य अमल और मीठा था उसी में स्नान किया और पान किया .तभी से किन्दुबिल्व ग्राम में "जयदेई-गंगा" नाम से प्रसिद्ध है


                                                                             “जय जय श्री राधे”
 

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!! जय जय श्री राधे !!
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Comments
2013-03-01 09:18:41 By Arun Bhardwaj

JAI HO JAI HO
HARI BOL

2011-12-28 13:22:51 By manoj jaswal

hari ka nam banaye sab kam

2011-10-17 12:22:11 By Vandana Goel

JAI!

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